(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.32. अध्यायः 032
अथानुगीतापर्व-2
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
ब्राह्मणेन स्वभार्यांप्रति कामक्रोधादिपरित्यागपूर्वकं भगवदवबोधस्य परमपुरुषार्थसाधनतावबोधकाम्बरीषगीतगाथाकथनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

ब्राह्मण उवाच।

त्रयो वै रिपवो लोके नवधा गुणतः स्मृताः।
हर्षः स्तंभोतिमानश्च त्रयस्ते सात्विका गुणाः॥ 14-32-1(93268)
शोकः क्रोधाभिसंरम्भो राजसास्ते गुणाः स्मृताः।
स्वप्नस्तन्द्रा च मोहश्च त्रयस्ते तामसा गुणाः॥ 14-32-2(93269)
एतान्निकृत्य धृतिमान्बाणसङ्घैरतन्द्रितः।
जेतुं परानुत्सहते प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः॥ 14-32-3(93270)
अत्र गाथाः कीर्तयन्ति पुराकल्पविदो जनाः।
अम्बरीषेण या गीता राज्ञा राज्यं प्रशासता॥ 14-32-4(93271)
समुदीर्णेषु दोषेषु बाध्यमानेषु साधुषु।
जग्राह तरसा राज्यमम्बरीष इति श्रुतिः॥ 14-32-5(93272)
स निगृह्यात्मनो दोषान्साधून्समभिपूज्य च।
जगाम महतीं सिद्धिं गाथाश्चेमा जगाद ह॥ 14-32-6(93273)
भूयिष्ठं विजिता दोषा निहताः सर्वशत्रवः।
एको दोषो वरिष्ठश्च वध्यः स न हतो मया॥ 14-32-7(93274)
यत्प्रयुक्तो जन्तुरयं वैतृष्ण्यं नाधिगच्छति।
तृष्णार्त इव निम्नानि धावमानो न बुध्यते॥ 14-32-8(93275)
अकार्यमपि येनेह प्रयुक्तः सेवते नरः।
तं लोभमसिभिस्तीक्ष्णैर्निकृत्य सुखमेधते॥ 14-32-9(93276)
लोभाद्धि जायते तृष्णा ततश्चिन्ता प्रवर्तते।
स लिप्समानो लभते भूयिष्ठं राजसान्गुणान्।
तदवाप्तौ तु लभते भूयिष्ठं तामसान्गुणान्॥ 14-32-10(93277)
स तैर्गुणैः संहतदेहबन्धनः।
पुनःपनर्जायति कर्म चेहते।
जन्मक्षये भिन्नविकीर्मदेहो
मृत्युं पुनर्गच्छति जन्मनैव॥ 14-32-11(93278)
तस्मादेतं सम्यगवेक्ष्य लोभं
निगृह्य धृत्याऽऽत्मनि राज्यमिच्छेत्।
एतद्राज्यं नान्यदस्तीह राज्य-
मात्मैव राजा विदितो यथावत्॥ 14-32-12(93279)
इति राज्ञाऽम्बरीषेण गाथा गीता यशस्विना।
आधिराज्य पुरस्कृत्य लोभमेकं निकृन्तता॥ ॥ 14-32-13(93280)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वणि द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ 32 ॥

Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Footnotes
7-32-1 गुणतः वृत्तिभेदात्॥ 7-32-2 अभिसंरम्भो द्वेषाभिनिवेशः॥ 7-32-3 निकृत्य च्छित्त्वा। बाणसंघैः शमादिभिः॥ 7-32-11 पुनर्जायति चेह तत्फलम्। फलक्षये भिन्नविदीर्णदेहः पुनर्मृत्यु गच्छति चैव जन्मनीति क.थ.पाठः॥ 7-32-12 नान्यदस्तीति विद्या यैश्चैव राजा विजितो मयैक इति क.थ.पाठः॥


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